रावण के नाश का कारण भी कबीर ही थे।


रावण के नाश का कारण भी कबीर ही थे।

गरीब, मैं मैं करै सो मारिये, तू तुं करै सो छूट वे।
इस मार में होशियार, गधा बने कै ऊँट वे।।
हूं हूं करै सो गधा होई, मैं मैं करै बोक वे।
 बंदा बिसारे बंदगी, तो श्वान है सब लोक वे।।

      रावण ने भक्ति के साथ-साथ अभिमान भी किया जिसके परिणाम स्वरूप जिस लंका को वह चाहता था उसको भी नहीं रख सका तथा सपरिवार नष्ट हुआ। जबकि रावण का ही सोदर (सगा) भाई विभिषण जो पूर्ण परमात्मा सतपुरुष की भक्ति सतगुरु मुनिन्द्र साहिब से नाम उपदेश ले कर करता था और अपने गुरुदेव मुनिन्द्र (यही कबीर साहेब त्रोतायुग में मुनिन्द्र नाम से आए थे) जी के आदेशानुसार आधीनी भाव से (अहंकार रहित) परमेश्वर की साधना किया करता था। उसको भगवान रामचन्द्र जी ने लंका का राजा भी बना दिया।

यह आधीनी भाव पूर्ण परमात्मा (सतपुरुष) की विधिवत (मतानुसार) साधना का परिणाम हुआ। इसलिए इस श्लोक में यही प्रमाणित करना चाहा है कि जो लोग अभिमानी होते हैं उनका ईश्वर साथ नहीं देता और जो आधीन (विनम्र) होते हैं तथा शास्त्रानुकूल साधना करते हैं उनको परमात्मा यहाँ की सर्व सुविधाओं के साथ-साथ पूर्ण मुक्ति भी देता है।

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